मंगलवार का दिन । कुछ उमस भरा सा मौसम, शायद आज सूरज भी अपनी दैनिक दिनचर्या से परेशान हो कही आराम कर रहा हो , पर मैं कही काम में व्यस्त आफ़िस के छोटे से दरवाजे के भीतर छुप की सी बैठी थी । दिन के 1:30 बजे थे, एकाएक ऐसा लगा मानों सूरज के साथ-साथ चंदा भी कही घूमने निकल गया हो । चारों तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा । मैनें उठकर बत्ती जलाई । कुछ ठंडी-ठंडी हवा ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा और मैं वापस बैठने की बजाय दरवाजे की ओर आगे बढी । हल्की-हल्की पानी की बूंदों का एह्सास तब हुआ जब मैनें गली के पानी भरे एक गड्डे की तरफ़ देखा । पानी की एक एक बूंद उस गडडे में गिरती हुई बिल्कुल सफ़ेद पारदर्शी मोती के समान लग रही थी । इच्छा हुई उन सबको अपनी गोद में भर लूँ । पर तभी उन मोती समान बूँदों ने अपना आकार खो दिया । मैं चुपचाप अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई और सामने टेबल पर रखी अपनी कापी व पेन उठाया और चल पडी उस सुन्दर एह्सास को रूप देने, जो चंद मिनटों पहले हुआ था ।
Tuesday, 11 June 2013
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